कतरा कतरा जिंदगी ..

सामान्य

    1
बालवाडी में
लगातार रोता रहा
मासूम माँ के
इन्तजार में

छुप कर रोती है माँ
और सिखाती है
दुनियादारी ….

     2

मनोकामना

तुम करती रही
बिना ये सोचे
पूरी हुई भी कितने बार

बार बार फिर भी…

 

    3

पन्नो में पुरखों
ने लिखी बड़े
काम की बातें
सहेजी धरोहर सी
आज उपेक्षित हो गई

        4

सबसे बड़े लोगों की
गाडी जब रास्ते से
गुजरती है
गरीबों के बच्चे
सड़क की छाती में
दुबक जाते हैं……

Advertisements

तमाम रंग …

सामान्य

   1

 

रामनगर की रामलीला में 
हर शाम रंगें जा रहें है 
राम के चेहरे 
मुल्तानी मिट्टी के 
लेप से 

जरा लीपी पुती जिंदगी 
भी है इन दिनों 

चिरई गांव का बंसी 

अपनी सब्जी का ठेला 
ढांप के धर दिया है 
अब एक महीने राम बनना है 

मंडली वाले सारा दिन करवाते हैं 
कुछ ना कुछ काम 

पर ..सियाबर रामचंद्र की जय 
सुनते ही बंसी भूल जाता है 
अपनी जिंदगी की सारी उलझने

अपने कंधे पर धनुष रखते 
फडकने लगती है उसकी भुजाएं 
वो चलाना चाहता है एक जादुई तीर 
जिससे बदल जाये देश दुनिया 
दुःख तकलीफें ..

राम राज खाली किताब में है 
कभी किसी ने नही देखी
अब तो देखना भी ना चाहें ऐसा राज 

जीतनी ईमानदारीसे बने हम राम 
उतनी ईमानदारी से प्रभू बंसी बन के देखो 

सब्जी के ठेले को दिन दुपहरिया 
गली गली ठेलते गुहार लगाते
सूख जाता है कंठ.. सूख जाती हैं 
हरी सब्जियां 

मुरझाया मुहँ लिए लौटते है घर 
साथ लाए चंद सिक्कों से बची 
रहती हैं सांसें 

जाने दो तुम नही समझोगे ….

आज रात बनवास के बाद दशरथ 
की रुदन वाली लीला है 

सभी कलाकार अभ्यस्त है 
ऐसी लीला के …….अभ्यास की 
कौनो जरुरत नही …

 
     2
 
सपनें तराशती रही 

अब हों गए ये नाख़ून से 

नुकीले 

नींद जख्मी है 

बिस्तर की बेचैन 

सलवटों पर 

रातें जागती हैं 

खारी नदी में

डूब गई आँखें 

बित गई रात …….

 
    3
 
समय था की मैं 
तुम्हारी जरुरत बन गई 

अब यू की 

अपनी जरुरत भर 
पहचानते हों तुम ……

 
    4
 
मीठी हँसी है तेरी 

जैसे पहली बार सुनो 
तो स्मृतियों में समाई 
सारी मुस्कराहटें 
जल भून जाये 

हलकी बयार सी छू जाती 
है तेरी हंसी 
और जब हंसती है 

तो तेरी आँखों में 
दिखता है तेरा मन 

तू हंसती रह …की जीता रहूँ मैं …….

 
       3
 
हथेलियों में पसीजता समय 
साथ के खत्म होने की बेचैनी 

फिर मिले ना मिले 
आँखों से छलकते सवाल 

जबाब में बस कोरी मुस्कराहट 
और स्पर्श की नरमी 

तुम दे जाते हों मुझे हर बार 

अगली बार मिलने का एक बहाना 

और उस बहाने को अपने सिने से लगा 
मैं करती हूं एक और बार 
तुमसे मिलने का खूबसूरत इंतजार ……..

 
       4
 
कई बार बुझ जाती है 
वो आग जिसपर 
सेंकती हूं 
मैं दिन की रोटी
आंसुओ से खारी 
पड़ती है रोटी 
और आग नही जलती 
उतनी देर जितनी 
उसे जलनी चाहिए

और इस तरह 
आटे पानी आंसू 
और आग के खेल 
में ..मैं जलती भी हू 
सिकती भी हूं 

पर नही बुझने देती 
भूख 

यही तो है 
जो बनाती है 
हमे जीवन को लेकर 
कुछ और जिम्मेवार ….

 
    5
 
मैंने जब भी तुम्हें जैसा 
कहा तुम वैसी हों गई 

जब मैंने बादल कहा तुम छा गई 
मेरे तनमन पर 

जब कहा कविता हों तुम 
तुम वो मिसरी सी मिठास 
रख जाती होठों पे 

जब कहा बयार हों 
सरसराती सी मुझे सहला जाती 

कितने रंग थे तुम्हारे प्यार में 

एक दिन मैंने तुम्हें औरत कहा 
तुम घर की सारी जिम्मेवारियां 
अपने कमर में खोंस 
खो गई ..और तमाम 
लोगों की भीड़ का 
हिस्सा हों गई ………

 
    6
पुरानी छत पर 
बैठ कर 
नए जोड़ों ने 

पुराने चाँद को देख 
कुछ पुँराने वादे 
दुहराए 

नई तारीख में 
लिखी गई 

एक और प्रेम कहानी 

एक था राजा एक थी रानी …….

 
      7
 
कागज़ का भयानक रावण
जल रहा धू धू कर 

अट्टालिकाओं में बैठा 
सुदर्शन रावण करता रहेगा 
अट्टहास 

हर साल होती है रामलीला 
महीने भर तक 

सालों साल मुस्कराता है 
अपनी लंका में दशानन 

उसके कारिंदे बचाए रखते है 
उसका राज पाठ 

रामलीला मैदान के मेले में 
माइक पर आवाजे कांपती हुई सी 
आ रही हैं 

असत्य पर सत्य की विजय 

हमारे कानों में भी पड़ती है ये आवाज 

आज के दिन के लिए…. कहते हैं 

यही है वो आखिरी भाषाई तीर 
जो कभी नही लगता निशाने पर 

आधे में बुझ गए रावण को बच्चे 
फिर से जला रहे हैं 

चंदे में मिले पैसों से राम लखन सीता 
अपना घर चला रहे हैं ……

 
     8
 
जिंदगी की इस अकेली डाल पर बैठे हुए हैं 
क्या करें क्या न करें की सोच लेकर 

शाम बैठी थी हमारे साथ 
कल कुछ देर को 

चाँद भी पत्तों में छिपकर 
पास सा था 

बह रही नदियों की ठहरी धार 

आँखों में थमीं थी 

याद की पुरवाइयों ने छू लिया था 

दूर जल कर खाक सा सब हो गया था 

सब दिशाएं भोज में आई थी उस दिन 

तुम नही थी …………..

 
     9
 
मेरे संग धूप जगती है 
मेरे साये 
मेरी करवट में मेरे साथ 
सोते हैं 

उचक कर मैं हवा में 
बह रही यादें 
पकडती हूँ 

झटक कर टांग आती हूँ 

उदासी में सने कपडे 

हथेली में तुम्हारे नाम को 
इतरा के लिखती हूँ 

किसी को हक़ नही की छीन ने 
मुझसे मेरे सपनें 

समय को साथ रखती हूँ 
सभी रंगों में अपने ख्वाब के 
मैं रंग मिलाती हूँ 

मैं अपनी रात को अपनी ही 
शर्तों पर जगाती हूँ 

पर आँखों में भरे बादल पे 
मेरा वश नही चलता 

मेरी खुशियों की चुगली में 
बिना मौसम बरसते हैं ….

 
   10
 
तुम यहाँ रुको 
मैं रुक गई 

जल्दी चलो 
मैं दौड़ पड़ी 

किसी से कुछ मत कहना 
चुप रही 

अब रोने मत लगना 

मैंने आंसू पि लिए 

देर से आऊंगा 
मैंने दरवाजे पर रात काट दी 

खाने में क्या ?
मैंने सारे स्वाद परोस दिए 

तुम्हारे झल्लाने से सहम 
जाते हैं मेरे बच्चे 

मैं तुम्हें नाराज होने का 
कोई मौका नही देती 

और तुम मुझे जीने का ……..

 
   11
 
घाट की सीढियाँ काँप रही हैं 
शून्य में डूबे पिता 
नही पहुँच पा रहे 
गंगा के निकट 
आज करनी है 
अम्मा की आखिरी विदाई 

बरसी …..

ऐसे कैसे विदा कर दें तुम्हें 

मन की कितनीं ही 
कोठरियों में 
लगी हैं तुम्हारे हाथ की बनी 
वो मजबूत सांकल 
जहाँ तुम डटी रहीं 
सुख दुःख को आने जाने का 
रास्ता दिखाती 

अम्मा ……आज हवा बड़ी तेज है 
जैसे उड़ा ले जाएगी सब जो संजोया है अब तक 
बचाने के उपक्रम में हम 
बिखर रहें हैं 

पंडितों के मंत्रोच्चार से 
नतमस्तक है बनारस 
हज़ार हज़ार दिया टिमटिमा रहा है 
सबमें मुस्करा रही हो तुम 

पिताजी ने पहनी है 
सफ़ेद धोती 

और हम सबने …सफ़ेद उदासी ……..

 
   12
 
रेत की चादर 
सुखाने डाल देता है 

भेज देता है 
लहर से शोख बच्चों को 

चादरे बेहाल 
किनारों पे पड़ी हैं ……

एसाइड

       1

 

अम्मा तारा बन गई 
अब आसमां का साथ 
निभाएंगी 

पिताजी खोजते रहे थे 
अलमारी की चाभी 
नही मिली 

गरम कपडे 
कहाँ रखीं हैं ?

बता जाना था ना …

भाभी ने खूब अच्छे से 
साफ़ किया पूजा घर 
वही दरवाजे पर ठिठकी रहीं देर तक 
पर नही लगाई आपने आवाज 
की भगवान का बर्तन बाहर रख दो 
हम साफ़ कर लेंगें 

भाभी को और भी काम है 
कुछ बोलिए ना जल्दी से …..

और पता है खूब गिरे हरसिंगार 
वो ऊपर वाली डाली के फूल भी 
जिन्हें अपनी छड़ी से तोड़ लाती थी आप 
उठा लो अम्मा ..सब मसले जायेंगे नही तो ..

बड़े लोग आये हैं घर में 
नही मिल रही है दरी चादरें 
औए वो बड़ा भगोना कड़ाही भी 
सब एक दूसरे का मुहँ ताक रहे हैं 

शाम कोअपने नियत समय पर 
आ रही है वो सारी गौरय्या
हमारे डाले दानों को देखती है अपने पंख 
फडफडा गुस्सा दिखाती है 
और उड़ जाती है भूखी ही 
भाई ने लुढ़का दिया है चावल का डिब्बा 
लो पकड़ो संभालो अपने परिंदों का 
ये संसार 

और कैसे छीन सकती हैं आप 
अपनी बेटियों से उनका मायका ??
नही रख पाएंगे आपके मखमली 
गोद मे अपना सर की आप 
सहलती हुई हमे सोख लेती हमारे 
सारे दुःख दर्द उदासी 

नही मानना हमे की नही हैं आप 
फोन लिए कर रहे हैं इंतजार 
नही पता हमे कुछ ….

बात करिये ना अम्मा 

बड़े दिनों से किसी ने 
बाबु…भईया….नही पुकारा हमें ……..

 
            2
 
खिड़कियों के कांच को जो धो रही थी 
है वही बारिश.. जो बिन मौसम 
मेरे संग रो रही थी …

थम गई थी सांस पौधों की 
छतें भींगी पड़ी थी 
उड़ गया था प्यार का पंछी 

पंख खोले आसमानी रास्तों पर 
घोंसलों में कांपती सी सिसकियाँ थी 

बेसहारा से लगे सब ….

पर पता है जिंदगी की धार पर 
तुमने सिखाया पैर रखना 
घोल कर के आसुओं के संग 
पिलाया मुस्कराना 

हम बड़े अब हों गए हैं 

हों नही तो क्या तुम्हारी बात है अब 
नींद में जागे हुए सब याद है बस 

डगमगाते से ये देखो चल रहे हैं 

साथ हों ना?हाँ ना ?बोलो 

मैं अंधेरों से जरा सा डर रही हूँ ….

थाम लो ना ……..

 
 
     3
 
बात है बस 

साथ का एहसास है बस 
बेमानी सी सहनुभूतियाँ भी 

सुदूर फोन से 
सुनाई देती है 
कुछ अपनों की चुप्पियाँ

कुछ दोस्त सहला जाते हैं 

उदास पड़ी सलवटें 

दिन रोज दस्तक दे 
जाता है बंद दरवाजों पर 

शाम पिछली खिडकी से 
करती है तांक झांक 

आकाश भी वही है 
कुछ फीका सा रंग लिए 
या भरी आँखे है मेरी …..शायद…..

कामवाली दूधवाले का हिसाब 
करना है 
रसोई में खाली डिब्बे 
भरने है 
गैस का भी सुना 
कुछ महंगा हों गया है 

तो चलो मन की आग पर 
जिंदगी का पेट भरने को 
कुछ पकाएं 

अब भूख को क्यों रुलाएं ……….

 
               4
 
जबसे उदास हूँ वो साथ है 

अचानक आये बाढ़ से दुःख में 
बह गई सबसे अडिग दिवार की 
मिट्टी साथ है 
बाकि है हथेलियों में 
वही पुरानी सोधी महक 

वो मेरे घुटनों के पास बैठा 
मेरी अँगुलियों में गिनतियों के 

समिकरण बनाता 
मेरी कांपती देह को 
संभालता 
कुछ नही कह पा रहा है 

यूँ भी और दिनों में 
वो कम ही बोल पाता 
पर मैं सुन लेती हूँ उसे 

कल अचानक मेरी आँखें 
चूमता बोल पड़ा ……

एक बात सुन ….कई दिन से 
सुबह नही हों रही …
सूरज भी अलसाया सा है …
पता है …मंदिर की घंटियों 
से बेसुरी आवाजे सुनाई देती है 

सच कह रहा हूँ 
वो देख सामने का आकाश 
फीका नीला है ना ??

और ये देख ..तेरी बिस्तर पर 
डूबने वाला चाँद तुझे ही देख रहा है …

अब बस भी कर …मुसकरा दे …

पता है मुझे …अब रो पड़ेगा वो 
मैं उसकी आँखों में गहरे 
मुस्करा पड़ती हूँ… ये कहती 

चल जा काम कर ….
मैं ठीक हूँ ….कहा ना …..

 
                     5
उजाले का एक दिया 
जलाना चाहती हूँ 

तेरा ख्याल भी 
बुझा बुझा सा है ….

मन मुसकराहट की पटरी पे 
चलता चलता 
उदासी के पत्थरों से 
टकरा जा रहा 
बार बार ……

 
 
            6
 
अबकी बनारस के घाट
मनभावन ना थे 

ना गंगा आरती में 
वो मंत्रमुग्ध करने वाला जादू 

सीढियों पर बैठे 
सभी भिखारी गुमसुम से थे 

शीतला मंदिर के फूल वाले ने 

नही थमाया हमारे खाली हाथों में 
चढावे का सामान 

मटमैली गंगा में बहते दिए 
अपनी दिशाओं से भटके 
लडखडाते चल रहे थे 

उस पार रामनगर की रेत 
पर हमारा बचपन 
अनंत में खो रहा था 

दिशाओं में अजीब तपिस है 

मल्लाहों ने बिना रिकझिक के 
बैठा ली है सवारी 

अस्सी से मणिकर्णिका के 
सफर पर निकल गई है नावं 

बेआवाज है घाट की चहल पहल 

विदेशी पर्यटक उतारते रहे 
अबतक की सबसे बेरंग शाम की तस्वीरे 

बनारस के सारे रंग अम्मा ले गई ……

अम्मा जीती रहीं बनारस 
अब सुलग् रहा है बनारस उनके साथ साथ ….

 
 
                            7
 
राजघाट के पुल से गुजर रही 
मेरी ट्रेन 

सेकेंड क्लास का डिब्बा 
याद आया 

….ये है राजघाट का पुल 
बच्चे जा रहे स्कूल …..

भाई बहनों के साथ आती आवाजें …..

भूख तो ऐसी की हर दस मिनट पर लगती थी 
बेंत की डोलची अम्मा के सामने ही 
धरी रहती 
बारी बारी से पूरी भुजिया अचार देती 

एक चम्पक एक नंदन का सही 
बटवारा करते हम आपस में जूझते रहते 
खिडकी वाली सीट पर अम्मा हमेशा 
अपने थर्मस से पीती रहती चाय 

गर्मी की छुट्टियों में अक्सर हम 
अम्मा के साथ पिताजी के पास जाते 

पर इस बार अम्मा ने ये अलग ही यात्रा 
की अकेले जाने वाली तैयारी कर ली 

पर पता है जब आप अपनी इस यात्रा में 
राजघाट के पुल से गुजरेंगी ना …..

धडधडाती आवाज के साथ 
हम सब गंगा मैया को प्रणाम करते हुए 

गायेंगे वही गाना 

ये है राजघाट का पुल… इसपर बैठा है बुलबुल 
बच्चे जा रहे स्कूल ……..

आप जरुर सुनियेगा …

सुनेंगी ना हमारी आवाजें ……..

 
              8
 
चलो कहीं दूर चलते हैं 
चलोगे साथ ? 

हाँ बोलो कहाँ ?

वहां जहाँ फूल मुरझाते ना हों 
ना बदलती हों हवा 
कभी गर्म कभी सर्द 
जहाँ रुका हों समय 
जहाँ बदलते ना हों 

रिश्तों के रंग 
पहाड पर जमीं घास भूरी ना हों 

वहाँ जहाँ आहटों से घबरा 
ना जाते हों परिंदे 
मिलने की गुनगुनाहट के साथ 
गाये ना जाते हों विरह के गीत 

शाम पर अँधेरा छा रहा है 
वो मेरे हाथों पर 
थपकियाँ दे 
जगा रहा है मुझे 

देखो सारे पत्ते झर गए 
फिर नए आयेंगे 
कल सुबह ले चलूँगा तुम्हें 
दूर नदी किनारे 
आती है बस्ती से 
मछुवारों के गाने की आवाजें 

जिन्दगी संगीत है …

अभी घर चलते हैं …….

 
              9
 
अभी अभी देखा 
मेरे दुपट्टे के कोने में 
बंधी है एक गाँठ 

स्मृतियों के पन्ने खुलने लगे 
एक एक कर 

समंदर किनारे बनाया था 
एक तिनकों का घर 
हमने साथ साथ 

बड़ी कोशिश से 
बालू की दीवारें बनाई थी 

तुम मेरे दोनों हाथो को दबा देते बालू के ढेर में 
ये कह कर की घर बनाने का काम 
मेरा है ….
तुम्हें जब कहूँ तब आना ..

मैं तुनक कर मुँह फेर लेती 
पर सच… मन ही मन खुश होती थी 

पता नही कब बाँध दिया तुमने 
मेरे दुप्पटे से अपने रुमाल का कोना 
और बुलाया मुझे अपनी ओर

ये लो तुम्हारा घर ..पसंद आया ?
चलो इसके फेरे लेते हैं 

घर के फेरे ??? हाँ लेते है प्यार करने वाले 
तुम जो कहते मैं मान लेती ..मान लिया ये भी 

समंदर उफन रहा था ..लहरें 
किनारों के हौसलों को पस्त करने की 
पूरी तैयारी में चल पड़ी थी 

हमारी आँखों के सामने 
हमारे सपनों का घर लहरों की बली चढ़े 
हमे मंजूर ना था 
हम जल्दी से निकल आये वहां से 

मासूम प्यार की कश्ती में 
आज भी सवार है हमारी आवाजें 
समय की रेत पर अडिग है 
तिनकों का घर 

मैं तुमसे बहुत प्यार करती थी 
आगे भी करुँगी… बाँधली मैंने अपने दुपट्टे में 
एक और गाँठ… तुम्हारा रुमाल तुम्हारे पास हैं ना ?

तुम भी बाँध लो …प्यार में ऐसा करते हैं …..

 
    10
 
मैं नही समझ पाई 
पत्तियों का कम होता 
हरा रंग 
संकेत था 

बिछड जाने का 

तमाम दिनों से बुझी बुझी सी थी वो …..

 
                11
 
 

आला रे आला गणपति आला ….

सामान्य

पूरा शहर इसी रंग में रंग हुआ है …जिधर देखों उधर सजा हुआ है पंडाल …बरस भर बाद आये गणपति के स्वागत में 

तैयार है पूरा बाजार …स्कूलों में छुट्टियाँ है ….शहर  की सभी बिल्डिंग से आ रही है आरती की आवाज…सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता

विंघनाची….

 

                     सब खुश हैं प्रभु आपके आने से ..नवरतन बैंड ..स्वागत बैंड और भी बैंड वाले ..किशना ने भी बना लिया 

है तीन लडको के साथ मिलकर एक बैंड …तीनों को काम मिलता है इन दस दिनों में …कमाल है ना एक बरस अपनी जिंदगी को जैसे तैसे बिताने वाले बिना किसी शिकायत लगे है आपके आगमन और विसर्जन की तैयारी में ..जरा जरा सी बात पर 

खुश होते है लोग ..आप कभी देखिये इनकी आँखों में इतने बड़े सपने भी नही होते कई बार ये तो बस जीना चाहते है ..पर टूट जाते है प्रभु ….आपकी तो दिव्यदृष्टी है ना देखा ही होगा आपने ..आबिद संतोष रघु काका ये सब शहर में बनने वाले कई 

पंडालों में करते रहें है काम …सधे  है इनके हाथ बल्लियों को संभालने सीधा रखने और डरावनी उचाईयों तक जाकर पंडालों को भव्य बनाने  में …पर ये बिचारे मेहनत के सभी काम जानते हुए बड़ी मुश्किल से अपनी जिंदगी को बचाए हुए  हैं ..ये भी खुश है …कुछ दिनों कुछ पैसे आते रहेंगे …कुछ रंग ये भी देख पाएंगे शायद …

अरे हाँ तमाम बच्चों की तरफ से भी मैं आपका आभार मानती हूँ  देवा ..वो जो रस्ते पर सारा दिन बिन माँ बाप के बिखरे रहते थे ..गाड़ियों की तेज रफ़्तार से ना डरते हुए मांगते रहे पैसे अपनी जिंदगी को रेंगते हुए बचा लेने की चाहत में वो खुश है इन दिनों …कहीं भी किसी भी पंडाल के आस पास मंडराते रहते है अभी माँगने के लिए जान की बाजी  नही लगानी  पड़ती ..दया भाव वाले लोग कुछ ना कुछ दे ही देते हैं ….

 

तो बात इतनी सी है की सब खुश है …आपके आने और जाने तक बहुतों की जिंदगी की गाड़ी सरकेगी जरा ठीक ठाक से …बाद में तो वही रोना काम नही..पैसा नही..रहने को जगह नही …बीमारी है पर इलाज नही….बचा सकते थे पर बचा नही पाए …

औरतों के चेहरे से भी रंगत गायब …कामवालियां भी मुस्कराती रही थी इन दिनों ….बड़े छोटे पंडाल में मेहनत करने वाला वो छोटा आदमी हमेशा छोटा ही क्यों रहता है भगवान?

शहर भरा है तुम्हारे भक्तों से …गरीबी भी वैसे ही भरी पूरी है ..लाचारी भी है …कुछ बदलता नही ..आपकी कृपा के आसरे रहते हैं सब.. आप देखते तो हैं पर …कई बार लगता है कुछ लोगों पर नही रहती नजर जो भूखे सो जाते है ..जो अपनी दस रुपये की कमाई से आपको दो रुपये की माला रोज चढ़ाता है …जो दर्द में भी आपका नाम पुकारता है ..सब खोने पर भी आपको पाने की कामना करता है ..उन्हें अकेला क्यों छोड़ देते है ?ये दस दिनों की खुशी जरा बढा नही सकते ….बच्चे मुस्कराते हुए कितने अच्छे लगते है …….

 

सबसे मोहक है आपका विसर्जन ..ये जोर जोर से ढोल नगाड़े की आवाज …ये धूम …ये पटाखे …रंग बिरंगे कपड़ों में लोग 

पीढे पर आपको अपने हाथों में उठाये नंगे पैर समंदर की ओर जाते हुए ..आपसे फिर आने का वादा लेते देते हुए ….और तमाम टोलियों में नाचते लोग ….जिस रस्ते से गुजरते झोपडियों के बच्चे नाचने को मचल उठते …सब आकर नाच रहे हैं …

आप विदा हों रहे हैं आँखें नम भी होती है …एक लाडला मेहमान चला जाये तो कितना सुना लगता है सब बिलकुल वैसा …सभी पंडालों से आप विदा हों रहे हैं एक एक कर …मजदूर वही बल्ली खोलने वाले रस्सिया लपेटने वाले …गाली धक्का खाते काम निपटाते …आपके आने की राह निहारते रहेंगे ….

 

समंदर में आपको विसर्जित कर आये ….तो आप क्या सचमें चले जाते हैं?नही देखते पलट के भी ..की पीछे रघु काका का घर कैसे चल रहा है…किसना बैंड वाले तीनों लड़के बेबसी में भी पिटते है नगाडा कई बार.. की रियाज कर रहे है …उनके खालीपन की आवाज क्या सच में नही पहुचती आपतक ???

 

आइये ना गणपति बप्पा कुछ ज्यादा दिन की खुशी लेकर की खुश रहे तमाम छोटे बड़े लोग पंडाल में बस सजे भर रहने से क्या फायदा ..बाहर देखिए भी दुनियाँ कैसी हुई पड़ी है …सबके लिए खुशियाँ रुकी रहें.. पेट भरे हों सबके.. घर के सपने पूरे करने ..मासूमों को प्यार माँ बाप घर का सूख देने पर भी विचार करिये ना एक बार …

 

गणपति बप्पा मोरया ..पुढच्या बरसी लॉकर या ….

आपको शत शत नमन ………

 

 

जिंदगी कैसी है कहानी

सामान्य

      1

रात के अँधेरे में
गाँव के पीछे रस्ते पर
दरिंदों की गाड़ी
रुकती है

परिंदे बेचे जाते
हैं

माँ बाप की
मुट्ठी में

कुछ गरम सी
रकम है
बरफ सा ठंडा
पड़ रहा है कलेजा

घुर घुराती सी चल
पड़ती है गाड़ी
मासूमों के रुदन
से चीत्कार उठती है
गरीबी बेबसी लाचारी

परिंदे फडफडा रहे है
नुचे पंख सी आहें
उनकी फैली पड़ी है रास्तों पर ….

             2

वो अपनी दोनों मुट्ठियाँ
एक जादूगर की तरह
हवा में लहराता
और कहता
एक चुन ले
मैं चुन लेती

कभी पास फे़ल का निर्णय
कभी खेलने पढ़ने का
कभी गद्दे तकिये का

ऐसे तमाम उलझन
झट से सुलझ जाते

वो बता देता जैसा उसे बताना होता
मैं मान जाती

एक दिन वापस बिना बात ही
उसने अपनी बंद मुट्ठियाँ
हवा में लहराई
मुझे चुन लेने को कहा

मैंने पूछा क्या है इनमें ?
उसने कहा किस्मत
मैंने पूछा बस इतनी सी?
उसने कहा
हाँ हाँ मेरी भी तो इतनी ही
मैंने चुन ली एक मुट्ठी
वो मुस्करा पड़ा

और चिढाने लगा
मेरी तो मेरे पास ही है

अब तेरी भी मेरे पास ……

मेरी मुट्ठी में ………

               3

हाथ में पूरे दिन की
कमाई मसलती है
कलेजा कसमसाता है
आँख भर भर ढरकाती है

पर नही खरीद पाती
जिद्दियाये बच्चे की खातिर
वो लाल पिली गाड़ी
जिसे रोज शीशे के पार
देखकर बिसूरता है वो देर तक

जबसे देखि है वो गाड़ी
बच्चे के सपने के साथ
उसकेसपनों में भी
आती है सीटियों की आवाज

अगले दिन फिर खड़ी
हों जायेगी घडी भर को
दुकान के इस पार
फिर मसलेगी पैसे
कसमसायेगी
बच्चा इंच भर की दूरी पर
पड़ी गाड़ी को निहारेगा

और रख देगा अपनी
नन्हीं हथेलियाँ उसके उपर
अपने हाथो में फोटो सी उतार लाएगा

खूब भागेगी गाड़ी सपने में
आएगी सीटियों की आवाज
बच्चा हथेलियों को
आँख पर रखकर
सो जायेगा …….

    4

कान्हां ,
नींद से जागने पर
तुम्हारे कितने नखरे
यशोदा उठाती थी
दुलारती थी पुचकारती थी

पर हम… समय की लात खा कर
आँखें मिचमिचाये
जाते हैं काम पर
खोजते है कचरे के ढेर पर जिंदगी

पर वापस कभी घर नही आतेकन्हैया ..रास्तों पर छोड़ दिए गए
हैं हम गाड़ियों के पीछे जीने और
मरने का संघर्ष करते हैं
बंदी है एक ऐसी जेल के
जहाँ का कानून कभी हमे
जिंदगी नही देता

तुम्हारे जन्म लेने पर क्या कहें
मत आओ धरती पर
बदल गया है रूप रंग
कंस की संख्या भी बढ़ रही है

और जो जन्मों कान्हां
तो हमारा भी जन्म करा दो
हमे यशोदा से मिला दो
गोकुल में करने दो मौज मस्ती
दूध दही की चोरी करवाओ

या की मिट्टी हुई दुनिया को
एक मुट्ठी में उठाओ मुह में धरो
उद्धार करो ……..

           5

सूखे पत्तों परखडखडाती है

तुम्हारी

आहट

तुम पास

आ रहे होंपेड़ को ठूंठ करने ……..

      6

मैं मिलूंगी तुमसे
समय के उस हिस्से में
जब सांसे खोजती है
अपना एकांतमन खंघालता है
अपनी उलझनें
और सोच की स्याही
सफ़ेद पड़ जाती है
लिखने से पहले

मिलने पर कुछ नही होता
मुझे पता है
कहने सुनने से परेहम साथ होने के
यकीन को निहारते हैं
कुछ लम्हों के लिए
और बिछड़ने की
रस्में आँखें निभाती हैंसांसें दुरूह चलती हैं
हाथ जड हों जाते हैं

औए हमारी अलग अलग
जिंदगियां हमे घसिटती हैं
अपनी अपनी तरफ

और हमारे बीच का शून्य
अपलक निहारता है
बीच की दूरी को

मिलने पर बिछड जाते हैं
हम बार बार ……..

          7

मैं साथ हूं उसके
मुझे होना ही चाहिए
ये तय किया सबने मिलकरमैंने सहा जो मुझे
नही लगा भला कभी
पर उसका हक था
मैं हासिल थीरातों की देह पर

जमने लगी सावली
परतों को उधेडती
उजालों की नज्म
को अपने अंदर
बेसुरा होते सुनती

इरादों से वो भी किया

उसके लिजलिजे इरादों
की बली चढ़ी
व्रत उपवास करती हैं
सुहागिने मैंने भी किया

थोपने को रिवाज बना लिया
जो ना करवाना था
वो भी करवा लिया
पाप पुण्य के
चक्र में ..इस जनम उस जनम
के खौफ ने

मैंने बेंच दिया अपना होना
तुमने खरीद लिया …….

मेरे जन्मदिन पर …….

सामान्य

 

 

 

 

अम्मा ने बताया था
आज के दिन नैनीताल
के रानीखेत में
जन्म हुआ मेरा

सबने मेरे होने की
बधाई की जगह
आ कर दी थी
सहानुभूति.. की
सांवली लड़की हुई

मेरे बड़े और गोरे
रंग वाले भाई बहन ने
मुझे मुस्कराकर देखा था

सबसे ज्यादा खुश
वो दाइ जी हुई थी
जिसने अम्मा को
अपने पहाड़ी नुस्खों से
मुझे गोरा बना देने का
भरोसा दिया था

खूब सफ़ेद बरफ गिरती थी
अम्मा कहती वो मुझे
शाल में लपेट कर रखती
और कोट पैंट पहने हुए
मेरे भाई बहन
कभी कभी छूते मुझे

मैं पहाड़ी गाना सुन
कर मालिश करावा लेती
बरफ गिरने को
टुकटुक कर देखती
अम्मा के आँख में
दूसरी लडकी होने की
मायूसी को भी
समझती

अम्मा बताती है
कई बार जब रातें ठिठुरा देती
मैं आखिरी बार हाथ उठाती
जरा सी आँख खोल
अम्मा को एकदम आखिरी बार
देखती और मैं
मरते मरते जी जाती

मुझे लगता है मेरे
अंदर पहाड जीना चाहते थे
नदियाँ झरने मुझमे
बहते थे और मैं
जीना चाहती थी
ये जिंदगी अपनी
कविताओं को जिंदा करने
के लिए ………

 

 

 

 

ज्यादा से ज्यादा ….

सामान्य

 

 

 

ज्यादा से ज्यादा क्या होगा
बहोत याद आओगे
ज्यादा से ज्यादा
नींद नही आएगी मुझे
मन उदास रहेगा
खाना बेस्वाद बनेगा

लगेगा कुछ नही
करने को
सब खो गया का एहसास
गहराएगा
फोन पर आते हुए
हर नम्बर में
देखूंगी तुम्हारे नम्बर का
ना आना

तुम्हारी आवाज कहीं
आती सी जान पड़ेगी
ज्यादा से ज्यादा
बेचैन रहूंगी

पर क्या.. कम से कम तुम
कभी ये समझ पाओगे
की हों तुम मेरी
जिंदगी में इतना ज्यादा

की मैं इसे कम नही कर पाती …….