Author Archives: shailjapathak

किशोर उम्र सपनें

सामान्य

​मिटटी मिलते ही 

लड़की आटा गूथ देती

एक चूल्हा एक चौका एक थाली गढ़ती 

मुंडेर पर रखती 

सूरज को कहती जरा तेजी से सुखाये 

उसके बनाये बर्तन 

रात भर चैन ना लेती 

नाख़ून के सूखे माटी को खुरचती 

सबकी नजर बचा देख आती आँगन का मुंडेर 

बस सूखने ही वाले हैं बर्तन 
लड़का मिटटी से बनाता चार पहिया 

जंगलों से चुनता लकड़ी 

सजाता बैल गाडी 

लड़की अपने बर्तन चौका के साथ 

अपनी गत्ते की गुडिया लाती 
दोनों आँगन के दूसरे कोने से यात्रा करते हुए

उपर छत की बरसाती में पहुचते 

नींम के पत्तो का कसोरा खट्टी बेर का दोना 

पुडिया में बंधा चटपटा नमक 
जिन्दगी बैलगाड़ी के पीछे भागती लडकी को थका गई गत्ते की गुडिया कुरूप सी है 
याद के गमछे पर लड़के के साथ लेटी लडकी 

बताती है 

कभी दूर हुई ना तो उस तरफ वाला तारा बनूँगी 

लड़का आसमान की गहरी नदी में अपनी बैलगाड़ी डुबा देता 

तीखी धूप ने बर्तन को सुखाया नही दरका दिया 
समय ने सबसे मोहक तस्वीर खिची 

मेरे शहरी डायरी में जलता है 

कच्ची मिटटी का चूल्हा 

प्यार की सोधी महक के साथ…..

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परदेश की राखी

सामान्य

​अक्सर राखी के एक दिन पहले आते थे, चाची के भाई बड़ी अजीब चहल पहल होती तब, बाहर दुआर पर बाबा चाचा लोगो के साथ कुछ देर खर खलिहान की बात होती ,घर के अंदर संदेसा भेज दिया जाता की सिघरौरी वाली के भाई आये हैं | चाची बक्से से निकाल कर कोई सितारे वाला साड़ी पहन लेती खटिया पर नया फूल कढाई वाला चादर बिछा देती, निचे से एक मचिया निकाल कर गुटरी बन बैठ जाती ।
अब कुछ घंटा बीत जाने पर भाई को अन्दर बहन से मिलने भेजा जाता । चाची दबे गले से रोती ..भाई खटिया पर बैठ चुप होने कहते ..चाची के भाई की खाने की थाली इसी कोठरी में भेजी जाती । चाची तटस्थ होकर खाना खिलाती और खीर सब्जी लेने का मनुहार करती धीरे धीरे अम्मा बाबु खेत गाय सखियों के हाल पूछती ।
अब स्पंज वाली बड़ी राखी बांधती टीका लगाती दही चटाती और कहती सेहत कमजोर है खाने का ध्यान दिया करे।
एक प्लास्टिक की थैली में साड़ी चूड़ी सिदुर खटिया के किनारे रखा होता ।भाई मुठ्ठी में 100 रुपया थमा देता ।अब जाने की बारी । 
अब जो विलापने की आवाज आती हमारे हाथ के खेल रुक जाते घर की बाकी औरतें बुझे चूल्हे के सामने बैठी आँख पोंछती दुआर पर चूप्पी तन जाती चाची ना जाने कितनी कहानी की गांठे खोलती रोती रोती । भाई अपराधी सा खड़ा रहता  आँख नीची किये ।आँगन से उनके बाहर निकलते ही चाची कढाई चादर को तहा के छाती से लगती साड़ी की थैली अपने गोदी में समेट भरे नैहर का आशीष मांगती सत्ती मैया से ।
भाई जा रहा है बहन भूसा घर के झरोखे से अपना आँगन बचपन देख रही है ।चाची लम्बा कमीज पहने भागना चाहती थी भाई के पीछे बगीचे तक चाची को मोटर गाड़ी देखना है । 
तुम्हारे माथे पर आशीष का कुम कुम हमारी आँख का सावन भादो । भूसा घर की छोटी खिड़की से ना जाने कितनी आँखें तुम्हारा रास्ता देख रही होंगी भाई । करेजे में हूक हो रही है जल्दी आना ।।।।

हमे तुम याद करना 

सामान्य

​फिर वही रात वही ग़म वही तन्हाई है…..
हमारे बाल ज्यादा लम्बे कैसे भला ..तुम जोर से खीच कर भाग जाते ..ऐसे …हमारे दोनों कंधो पर तेज कसे फिते के फूल सा मुस्कराते हो तुम ..तुम्हारे खुश रहने के लिए रोटी में ज्यादा देशी घी लगाया गया हमेशा ..अम्मा के सारे गहने तुम्हारी दुल्हन के लिए सुरक्छित ..
हाँ हमारे पास भी है बहुत कुछ …छुपा कर रखी तुम्हारी दी वो डेढ़ सौ रुपयेकी चौकोर दिवार घडी …जिस दिवार पर टगी है पिछले तमाम सालों से अपने टिक टिक से मेरे घर को धडकाती रहती है ..हमारी थाली में गुड चना हल्दी दही और अक्षत का शगुन है ..समय समय पर हम ये तुम्हारी ओर कर देते हैं ..इसे भर दिया करो ..अपने साथ होने के यकीन से .हमे बार बार इस त्यौहार उस त्यौहार पर बुला लेने के अनुरोध से ..सावन में मायके का झूला की कसमे खिला कर ..
हमारी खाली थालियों में लाख लाख टके के जेवर झिलमिला जायेंगे ….वरना खाली थालियों की चम् चम् में हमारी जोड़ी भर भरी आँखें तैर जाएँगी ..
तुम्हारे बिना भाई ..जिंदगी डोली के एक कोने पर गठरी सी सिसकियाँ है जिसे गाँव की सत्ती माता समझती हैं वहीँ से अलग हुए थे ना तुम हमसे ..
डोली से पर्दा उठा कर आखिरी बार झाकती हमारी सूनी आँखें ..पगडण्डी पर घुटनों में सर छुपाये तुम …ये भाई पागल होते हैं या बहनें चुड़ैल …………पीछा ही नही छोड़ती .
देखा फिर खीच दी ना तुमने हमारी चोटी???

अम्मा

सामान्य

​माटी लेखा माई ( अनुदित ) 
कोइला के भठ्ठी लेखा दहकत 

तु त माटी रहलु माई 

गजबे सोन्ह गमकत 

रोटी जरि ना जाउ तें छिरिक देत रहले पानी 

हमनी के भागि जात रहनी जा तोरा लगे उड़त लुत्ती से 

हमनी के कबो ना / कबहूँ ना /  कतहूँ ना जात रहनी जा 
माई ! तू गजबे रहलू 

तहार सपना हमरा खातिर कुछउ ना रहे 

बस अतने के मुस्कियात रहीं हम 

घर मे नून-चीनी जनि होखे कबो कम 

दीवार कबो भींजे ना 

दरवाजा के बाजत सिकड़ी डेरवावत सनेसा ना दे जाई  

हम जहँवा भी रही , बस हाल्दे घरे आ जाई 
पहिला बेर पंडी जी के हमार कुंडली देत 

पूजा घर मे काहें गइल रहलू 

काहें रुकल रहलू चुहानी के दुआरी प 

तू पहिला हाली तपत आगि से काहें डेराइल रहलू 

भर रात बेर-बेर आ के सिरहाना काहें खड़ा हो जात रहलू 
हँ , आंखि के पानी नूनछाह , खार रहेला 

खूबे कइले बानी , मानी अपना मन के मनमानी 

धउर के उठावत रहनी भरल बाल्टी के पानी 

छलक जात रहे , बिछिला के , कतना ठठा के हंसत रहनी 
घर के ओरियानी आपन उड़ान छोड़ आइल बानी 

लुत्ती से सकपका जानी अपना नइहर के चुहाँई मे 

पीतर के खाली बाल्टी मे पानी लेखा भरल बानी 

अबहिँयो तहार गोड़ छुवत आंखि ना मिलावेनी 
कोइला के भठ्ठी लेखा दहकत 

माटी लेखा भींज जानी 

अब तू काहें ना कहेलू 
अरे बुरबक , इंतजार करु 

हम बस छन दे गइनी / छन दे आइब … 

कुछ लोग गइला के बाद लवट के ना आवेला । 
मूल रचना ( हिन्दी मे )  – शैलजा पाठक 
अनुदित (  भोजपुरी मे)  – नबीन कुमार

यूँ ही

सामान्य

भींगी गौरय्या की नम आँख में मैंने हरे पेड़ की परछाई देखी आस्वस्त होना चाहती है गौरय्या उसे डराओ मत … वो आज खुश है

हरे पेड़ घोंसलों से भरे हों ….और चिड़िया का बेबी रेन रेन गो अवे गाने लगे कितना अच्छा हो वो तितली की ऊँगली पकड़े इस्कूल जाने लगे … 😊😊😊😊😊😊

एकांत में महकती है गाँव की याद

सामान्य

बाबा बाहर की चौकी पर ध्यान रमा कर बैठते ..मुझे पता था किसी चौपाई पर नही ठहर रहा है उनका मन ..घर में क्या बन रहा..कौन आया..बातें क्या हो रही हैं…चाय बनी थी क्या फिर से…वो इन बातों का जबाब चाहते ..मैं हूँ ना बाबा बन की तितली.इधर उधर सारी बातों का सामान्य गूढ़ पिटारा..मेरे हाथ हमेशा मिटटी से भरे होते..और बाबा की आँख इंतजार से..मेरे पास जाते ही अपने गमछे का एक हिस्सा चौकी पर मेरे लिए बिछा देते ..

अपनी धोती के कोने से मेरा हाथ पोछते फिर अपनी आँख ..का बाबा ?? एगो गीत गइबे…मैया मोरी मैं नही माखन खायो ..अभिनय के साथ ..बाबा विभोर हो मेरा नादान अभिनय देखते..मैं बताती बाबा जब लाल नीला लाइट पड़ता है ना तब कान्हा का मुकुट खूब चमकता है..स्कूल के स्टेज की बात…पर बिना लाइट बाबा की आँख चमकती..उनके गमछे को कमर में बाँध एक छोटा सा लकड़ी उसमे खोंस जब मैं उनकी तरफ फेंकती..ये लो अपनी लकुटी कमरिया..तब बाबा हाथ फैला देते..ऐन्गा ना रिसियाए के बाबू….अब मुस्कराती चौकी पर बाबा ताली बजा कर मेरे गाने को कसम से बेसुरा गाते..बाबा ऐसे नही ऐसे नही…

बाबा ..हमारे स्कूल में नाटक भी होता है ..मेरी दोस्त को परी बनाया गया बाबा . परी गोरी होती है न ? बाबा मेरा गाल छूते बोलते नही तो तोर दादी सांवर रहे लेकिन परी लेखा जादू क छड़ी रहे ओकरा पास । कैसे बाबा ? बाबा के आँख के बियाबान में मिनटों में स्वाद परोसती दादी उभर आती । मुश्किल दिनों की औरत कम्मो में काम चलावे वाली अन्नपूर्णा .. मैं भी दादी की तरह परी बनूँगी बाबा । स्टेज के ऊपर के चरित्र पर्दे के पीछे बदल जाते है ।मैं जिंदगी भर वाली परी बनूँगी बाबा … हाँ बिल्कुल .. चटकते गर्म तवे पर जब पहली बार हाथ जला तब मेरी आँख गुलाबी थी पर मैं नही रोइ । परियां रोती नही न .. बाबा अपना मैला गमछा दिखाते और कहते .ई तोरा दादी एक बार हाथ लगा देती न बबुनी त इहे गमछा लकालक हो जात रहुये .. दादी कितने रंग गन्ध स्वाद के साथ उस गमछे में समाई थी । देह माटी हो जाई एक दिन ।पर उस मिट्टी में कितनी कहानी दबी होगी। मैं तो परी हो गई हूँ बाबा .. गमछे के कोर में सुबकती याद…

गमछे ने बाबा का खूब साथ निभाया..कभी बिस्तर बना कभी पगड़ी..कभी कमर में बंधा कभी सर पर..कभी दाना से भरा कभी सब्जी से कभी हम सोये मिलते उसके नीचे ऊपर बाबा की थपकी..गाँव की मिटटी धीरे धीरे झर चुकी थी ..अब कुछ कहानियां बची थी उनके जेहन में वो भी रूठी सी रास्ता विषय सब भूल जाती ..

हमारे बुजर्गों के पास उनके अनुभव की अकूत सम्पत्ति है ..उनकी कहानियां इस लिए भूल जाती है रास्ता की हम सुनते ही नही कभी बैठकर ..की समय नही.बकबक कौन सुने..वही वही बात…हम भी उसी पटरी से अपने उसी उम्र की गाडी से गुजरेंगे..हवा से कोई पुराना गमछा जो पास उड़ आये तो समेट लेना..उसमे कहानियां हैं.भजन है..बाबा की ताली की आवाज है..मिटटी की महक है..और उनकी आँख की रौशनी है..जो धीरे धीरे बहती थी..जिसे बाबा छुप कर पोंछ लेते थे ….

.एकांत में बाबा ने सुनाई थी घर खेत छप्पर अटीदार पाटीदार की कहानी…आज अपने एकांत के पन्नो पर लिखते हुए समझा मैंने…..

समय से पहले बड़े होते बच्चे …

सामान्य
आरी आजा निन्दियाँ की थपकियों से नही सोते बच्चे …न ही जागो मोहन प्यारे की भैरवी सुनकर खोलतें है आँखें ….ये अपनी उम्र से बड़े हो रहे हैं …महानगरों में नही होती ऐसी माएं जिनके आँचल में प्यार दुलार पाते हो ये बच्चे ……घर के नाम पर एक धरमशाला है जहाँ सभी सोते हैं रात में …पति पत्नी सुबह से ही चले जाते हैं काम पर …घर में रखी कामवाली करती है बच्चों की फिकर ..या बस  उतनी ही फिकर जितने के पैसे मिलते है उसे ….इनकी पूरी दुनिया होती है इनके कमरे में ….खूब बड़ी बड़ी किताबे जिसमे बने होते है भविष्य के सपनों वाली तस्वीरे ..ये अपने आप को पाते हैं उनमें …इनके पास कुछ नंबर होते हैं …जैसे आस पड़ोस के किसी अंकल आंटी के ..कभी जरुरत पड़ने पर ये उन्हें मदद को बुला सकते हैं …..कुछ और नंबर हैं जिसका उपयोग ये हमेशा करतें हैं ..जैसे पिज़्ज़ा बर्गर वाली दुकानों के नम्बर ….नही चाहिए इन्हें मां के हाथ का बना गाजर का हलवा ……
 
कभी नही खेलते है छुप्पम छुपाई …लंगड़ी …भागो पकड़ो जैसे   भूले बिसरे खेल …इनके हाथों  में रफ़्तार वाले खेलों का खिलोना होता है ….कम्पूटर पर स्ट्रीट फाइटर वाले खेलों की जानकारी ..इनकी आखें गड़ी होती हैं अपने सामने की स्क्रीन पर जिसपर भागती हैं गाड़ियाँ एक दुसरे को पछाडती …..
 
कितनी कम संवेदना बची है ..मुझे तकलीफ होती है जब मैं देखती हूँ इन्हें इनकी उम्र से ज्यादा बड़ा …जरा से ज्यादा बड़े बच्चे अपनी पढाई अपने कोचिंग को लेकर दिनरात परेशां रहते हैं …..इन बच्चो की भी प्राइवेसी होती है …हमे मना कर देते हैं ये अपने कमरे में आने से …अपने दोस्तों से बातें करते हुए इशारे से हमे हट जाने को कहते ….हमारे बचपन की बातों को ऐसे सुनते हैं जैसे कितना बोर कर रहे हैं हम उन्हें ….plz मम्मा और भी काम है मुझे तुम जाओ ….जिन माँ बाप के पास समय नही है वो इन्हें समय समय पर पैसे देते हैं …और जो माँ बाप देते है अपना समय ये बच्चे उसे हस्तछेप मानतें हैं …
 
कितना कुछ बदल गया …जिसके बिना एक दिन नही रही वो बच्चा करता है विदेश में जाने की बात ..उसे अपना भविष्य बनाना है …और हमारा भविष्य ?
 
रिश्तो में बचाएं रखना है जो असर तो हमे बताना होगा जीवन मूल्य।।करना होगा अवगत अपनी संस्क्रती से .
.दिखानी होगी वो दुनिया जिनमे हम जीना चाहते हैं …इन्हें रफ़्तार में खोने से पहले बचा लेना होगा ..मन की ..रिश्तों की ..अपनों के दिल की गति के साथ मिलाना होगा ताल ..क्या नहीं  बचाना चाहते हम इन्हें ?