Monthly Archives: नवम्बर 2016

किशोर उम्र सपनें

सामान्य

​मिटटी मिलते ही 

लड़की आटा गूथ देती

एक चूल्हा एक चौका एक थाली गढ़ती 

मुंडेर पर रखती 

सूरज को कहती जरा तेजी से सुखाये 

उसके बनाये बर्तन 

रात भर चैन ना लेती 

नाख़ून के सूखे माटी को खुरचती 

सबकी नजर बचा देख आती आँगन का मुंडेर 

बस सूखने ही वाले हैं बर्तन 
लड़का मिटटी से बनाता चार पहिया 

जंगलों से चुनता लकड़ी 

सजाता बैल गाडी 

लड़की अपने बर्तन चौका के साथ 

अपनी गत्ते की गुडिया लाती 
दोनों आँगन के दूसरे कोने से यात्रा करते हुए

उपर छत की बरसाती में पहुचते 

नींम के पत्तो का कसोरा खट्टी बेर का दोना 

पुडिया में बंधा चटपटा नमक 
जिन्दगी बैलगाड़ी के पीछे भागती लडकी को थका गई गत्ते की गुडिया कुरूप सी है 
याद के गमछे पर लड़के के साथ लेटी लडकी 

बताती है 

कभी दूर हुई ना तो उस तरफ वाला तारा बनूँगी 

लड़का आसमान की गहरी नदी में अपनी बैलगाड़ी डुबा देता 

तीखी धूप ने बर्तन को सुखाया नही दरका दिया 
समय ने सबसे मोहक तस्वीर खिची 

मेरे शहरी डायरी में जलता है 

कच्ची मिटटी का चूल्हा 

प्यार की सोधी महक के साथ…..

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परदेश की राखी

सामान्य

​अक्सर राखी के एक दिन पहले आते थे, चाची के भाई बड़ी अजीब चहल पहल होती तब, बाहर दुआर पर बाबा चाचा लोगो के साथ कुछ देर खर खलिहान की बात होती ,घर के अंदर संदेसा भेज दिया जाता की सिघरौरी वाली के भाई आये हैं | चाची बक्से से निकाल कर कोई सितारे वाला साड़ी पहन लेती खटिया पर नया फूल कढाई वाला चादर बिछा देती, निचे से एक मचिया निकाल कर गुटरी बन बैठ जाती ।
अब कुछ घंटा बीत जाने पर भाई को अन्दर बहन से मिलने भेजा जाता । चाची दबे गले से रोती ..भाई खटिया पर बैठ चुप होने कहते ..चाची के भाई की खाने की थाली इसी कोठरी में भेजी जाती । चाची तटस्थ होकर खाना खिलाती और खीर सब्जी लेने का मनुहार करती धीरे धीरे अम्मा बाबु खेत गाय सखियों के हाल पूछती ।
अब स्पंज वाली बड़ी राखी बांधती टीका लगाती दही चटाती और कहती सेहत कमजोर है खाने का ध्यान दिया करे।
एक प्लास्टिक की थैली में साड़ी चूड़ी सिदुर खटिया के किनारे रखा होता ।भाई मुठ्ठी में 100 रुपया थमा देता ।अब जाने की बारी । 
अब जो विलापने की आवाज आती हमारे हाथ के खेल रुक जाते घर की बाकी औरतें बुझे चूल्हे के सामने बैठी आँख पोंछती दुआर पर चूप्पी तन जाती चाची ना जाने कितनी कहानी की गांठे खोलती रोती रोती । भाई अपराधी सा खड़ा रहता  आँख नीची किये ।आँगन से उनके बाहर निकलते ही चाची कढाई चादर को तहा के छाती से लगती साड़ी की थैली अपने गोदी में समेट भरे नैहर का आशीष मांगती सत्ती मैया से ।
भाई जा रहा है बहन भूसा घर के झरोखे से अपना आँगन बचपन देख रही है ।चाची लम्बा कमीज पहने भागना चाहती थी भाई के पीछे बगीचे तक चाची को मोटर गाड़ी देखना है । 
तुम्हारे माथे पर आशीष का कुम कुम हमारी आँख का सावन भादो । भूसा घर की छोटी खिड़की से ना जाने कितनी आँखें तुम्हारा रास्ता देख रही होंगी भाई । करेजे में हूक हो रही है जल्दी आना ।।।।

हमे तुम याद करना 

सामान्य

​फिर वही रात वही ग़म वही तन्हाई है…..
हमारे बाल ज्यादा लम्बे कैसे भला ..तुम जोर से खीच कर भाग जाते ..ऐसे …हमारे दोनों कंधो पर तेज कसे फिते के फूल सा मुस्कराते हो तुम ..तुम्हारे खुश रहने के लिए रोटी में ज्यादा देशी घी लगाया गया हमेशा ..अम्मा के सारे गहने तुम्हारी दुल्हन के लिए सुरक्छित ..
हाँ हमारे पास भी है बहुत कुछ …छुपा कर रखी तुम्हारी दी वो डेढ़ सौ रुपयेकी चौकोर दिवार घडी …जिस दिवार पर टगी है पिछले तमाम सालों से अपने टिक टिक से मेरे घर को धडकाती रहती है ..हमारी थाली में गुड चना हल्दी दही और अक्षत का शगुन है ..समय समय पर हम ये तुम्हारी ओर कर देते हैं ..इसे भर दिया करो ..अपने साथ होने के यकीन से .हमे बार बार इस त्यौहार उस त्यौहार पर बुला लेने के अनुरोध से ..सावन में मायके का झूला की कसमे खिला कर ..
हमारी खाली थालियों में लाख लाख टके के जेवर झिलमिला जायेंगे ….वरना खाली थालियों की चम् चम् में हमारी जोड़ी भर भरी आँखें तैर जाएँगी ..
तुम्हारे बिना भाई ..जिंदगी डोली के एक कोने पर गठरी सी सिसकियाँ है जिसे गाँव की सत्ती माता समझती हैं वहीँ से अलग हुए थे ना तुम हमसे ..
डोली से पर्दा उठा कर आखिरी बार झाकती हमारी सूनी आँखें ..पगडण्डी पर घुटनों में सर छुपाये तुम …ये भाई पागल होते हैं या बहनें चुड़ैल …………पीछा ही नही छोड़ती .
देखा फिर खीच दी ना तुमने हमारी चोटी???