अम्मा

सामान्य

​माटी लेखा माई ( अनुदित ) 
कोइला के भठ्ठी लेखा दहकत 

तु त माटी रहलु माई 

गजबे सोन्ह गमकत 

रोटी जरि ना जाउ तें छिरिक देत रहले पानी 

हमनी के भागि जात रहनी जा तोरा लगे उड़त लुत्ती से 

हमनी के कबो ना / कबहूँ ना /  कतहूँ ना जात रहनी जा 
माई ! तू गजबे रहलू 

तहार सपना हमरा खातिर कुछउ ना रहे 

बस अतने के मुस्कियात रहीं हम 

घर मे नून-चीनी जनि होखे कबो कम 

दीवार कबो भींजे ना 

दरवाजा के बाजत सिकड़ी डेरवावत सनेसा ना दे जाई  

हम जहँवा भी रही , बस हाल्दे घरे आ जाई 
पहिला बेर पंडी जी के हमार कुंडली देत 

पूजा घर मे काहें गइल रहलू 

काहें रुकल रहलू चुहानी के दुआरी प 

तू पहिला हाली तपत आगि से काहें डेराइल रहलू 

भर रात बेर-बेर आ के सिरहाना काहें खड़ा हो जात रहलू 
हँ , आंखि के पानी नूनछाह , खार रहेला 

खूबे कइले बानी , मानी अपना मन के मनमानी 

धउर के उठावत रहनी भरल बाल्टी के पानी 

छलक जात रहे , बिछिला के , कतना ठठा के हंसत रहनी 
घर के ओरियानी आपन उड़ान छोड़ आइल बानी 

लुत्ती से सकपका जानी अपना नइहर के चुहाँई मे 

पीतर के खाली बाल्टी मे पानी लेखा भरल बानी 

अबहिँयो तहार गोड़ छुवत आंखि ना मिलावेनी 
कोइला के भठ्ठी लेखा दहकत 

माटी लेखा भींज जानी 

अब तू काहें ना कहेलू 
अरे बुरबक , इंतजार करु 

हम बस छन दे गइनी / छन दे आइब … 

कुछ लोग गइला के बाद लवट के ना आवेला । 
मूल रचना ( हिन्दी मे )  – शैलजा पाठक 
अनुदित (  भोजपुरी मे)  – नबीन कुमार

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