Monthly Archives: अगस्त 2012

जिंदगी कैसी है कहानी

सामान्य

      1

रात के अँधेरे में
गाँव के पीछे रस्ते पर
दरिंदों की गाड़ी
रुकती है

परिंदे बेचे जाते
हैं

माँ बाप की
मुट्ठी में

कुछ गरम सी
रकम है
बरफ सा ठंडा
पड़ रहा है कलेजा

घुर घुराती सी चल
पड़ती है गाड़ी
मासूमों के रुदन
से चीत्कार उठती है
गरीबी बेबसी लाचारी

परिंदे फडफडा रहे है
नुचे पंख सी आहें
उनकी फैली पड़ी है रास्तों पर ….

             2

वो अपनी दोनों मुट्ठियाँ
एक जादूगर की तरह
हवा में लहराता
और कहता
एक चुन ले
मैं चुन लेती

कभी पास फे़ल का निर्णय
कभी खेलने पढ़ने का
कभी गद्दे तकिये का

ऐसे तमाम उलझन
झट से सुलझ जाते

वो बता देता जैसा उसे बताना होता
मैं मान जाती

एक दिन वापस बिना बात ही
उसने अपनी बंद मुट्ठियाँ
हवा में लहराई
मुझे चुन लेने को कहा

मैंने पूछा क्या है इनमें ?
उसने कहा किस्मत
मैंने पूछा बस इतनी सी?
उसने कहा
हाँ हाँ मेरी भी तो इतनी ही
मैंने चुन ली एक मुट्ठी
वो मुस्करा पड़ा

और चिढाने लगा
मेरी तो मेरे पास ही है

अब तेरी भी मेरे पास ……

मेरी मुट्ठी में ………

               3

हाथ में पूरे दिन की
कमाई मसलती है
कलेजा कसमसाता है
आँख भर भर ढरकाती है

पर नही खरीद पाती
जिद्दियाये बच्चे की खातिर
वो लाल पिली गाड़ी
जिसे रोज शीशे के पार
देखकर बिसूरता है वो देर तक

जबसे देखि है वो गाड़ी
बच्चे के सपने के साथ
उसकेसपनों में भी
आती है सीटियों की आवाज

अगले दिन फिर खड़ी
हों जायेगी घडी भर को
दुकान के इस पार
फिर मसलेगी पैसे
कसमसायेगी
बच्चा इंच भर की दूरी पर
पड़ी गाड़ी को निहारेगा

और रख देगा अपनी
नन्हीं हथेलियाँ उसके उपर
अपने हाथो में फोटो सी उतार लाएगा

खूब भागेगी गाड़ी सपने में
आएगी सीटियों की आवाज
बच्चा हथेलियों को
आँख पर रखकर
सो जायेगा …….

    4

कान्हां ,
नींद से जागने पर
तुम्हारे कितने नखरे
यशोदा उठाती थी
दुलारती थी पुचकारती थी

पर हम… समय की लात खा कर
आँखें मिचमिचाये
जाते हैं काम पर
खोजते है कचरे के ढेर पर जिंदगी

पर वापस कभी घर नही आतेकन्हैया ..रास्तों पर छोड़ दिए गए
हैं हम गाड़ियों के पीछे जीने और
मरने का संघर्ष करते हैं
बंदी है एक ऐसी जेल के
जहाँ का कानून कभी हमे
जिंदगी नही देता

तुम्हारे जन्म लेने पर क्या कहें
मत आओ धरती पर
बदल गया है रूप रंग
कंस की संख्या भी बढ़ रही है

और जो जन्मों कान्हां
तो हमारा भी जन्म करा दो
हमे यशोदा से मिला दो
गोकुल में करने दो मौज मस्ती
दूध दही की चोरी करवाओ

या की मिट्टी हुई दुनिया को
एक मुट्ठी में उठाओ मुह में धरो
उद्धार करो ……..

           5

सूखे पत्तों परखडखडाती है

तुम्हारी

आहट

तुम पास

आ रहे होंपेड़ को ठूंठ करने ……..

      6

मैं मिलूंगी तुमसे
समय के उस हिस्से में
जब सांसे खोजती है
अपना एकांतमन खंघालता है
अपनी उलझनें
और सोच की स्याही
सफ़ेद पड़ जाती है
लिखने से पहले

मिलने पर कुछ नही होता
मुझे पता है
कहने सुनने से परेहम साथ होने के
यकीन को निहारते हैं
कुछ लम्हों के लिए
और बिछड़ने की
रस्में आँखें निभाती हैंसांसें दुरूह चलती हैं
हाथ जड हों जाते हैं

औए हमारी अलग अलग
जिंदगियां हमे घसिटती हैं
अपनी अपनी तरफ

और हमारे बीच का शून्य
अपलक निहारता है
बीच की दूरी को

मिलने पर बिछड जाते हैं
हम बार बार ……..

          7

मैं साथ हूं उसके
मुझे होना ही चाहिए
ये तय किया सबने मिलकरमैंने सहा जो मुझे
नही लगा भला कभी
पर उसका हक था
मैं हासिल थीरातों की देह पर

जमने लगी सावली
परतों को उधेडती
उजालों की नज्म
को अपने अंदर
बेसुरा होते सुनती

इरादों से वो भी किया

उसके लिजलिजे इरादों
की बली चढ़ी
व्रत उपवास करती हैं
सुहागिने मैंने भी किया

थोपने को रिवाज बना लिया
जो ना करवाना था
वो भी करवा लिया
पाप पुण्य के
चक्र में ..इस जनम उस जनम
के खौफ ने

मैंने बेंच दिया अपना होना
तुमने खरीद लिया …….

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