Monthly Archives: जुलाई 2012

मेरे जन्मदिन पर …….

सामान्य

 

 

 

 

अम्मा ने बताया था
आज के दिन नैनीताल
के रानीखेत में
जन्म हुआ मेरा

सबने मेरे होने की
बधाई की जगह
आ कर दी थी
सहानुभूति.. की
सांवली लड़की हुई

मेरे बड़े और गोरे
रंग वाले भाई बहन ने
मुझे मुस्कराकर देखा था

सबसे ज्यादा खुश
वो दाइ जी हुई थी
जिसने अम्मा को
अपने पहाड़ी नुस्खों से
मुझे गोरा बना देने का
भरोसा दिया था

खूब सफ़ेद बरफ गिरती थी
अम्मा कहती वो मुझे
शाल में लपेट कर रखती
और कोट पैंट पहने हुए
मेरे भाई बहन
कभी कभी छूते मुझे

मैं पहाड़ी गाना सुन
कर मालिश करावा लेती
बरफ गिरने को
टुकटुक कर देखती
अम्मा के आँख में
दूसरी लडकी होने की
मायूसी को भी
समझती

अम्मा बताती है
कई बार जब रातें ठिठुरा देती
मैं आखिरी बार हाथ उठाती
जरा सी आँख खोल
अम्मा को एकदम आखिरी बार
देखती और मैं
मरते मरते जी जाती

मुझे लगता है मेरे
अंदर पहाड जीना चाहते थे
नदियाँ झरने मुझमे
बहते थे और मैं
जीना चाहती थी
ये जिंदगी अपनी
कविताओं को जिंदा करने
के लिए ………

 

 

 

 

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ज्यादा से ज्यादा ….

सामान्य

 

 

 

ज्यादा से ज्यादा क्या होगा
बहोत याद आओगे
ज्यादा से ज्यादा
नींद नही आएगी मुझे
मन उदास रहेगा
खाना बेस्वाद बनेगा

लगेगा कुछ नही
करने को
सब खो गया का एहसास
गहराएगा
फोन पर आते हुए
हर नम्बर में
देखूंगी तुम्हारे नम्बर का
ना आना

तुम्हारी आवाज कहीं
आती सी जान पड़ेगी
ज्यादा से ज्यादा
बेचैन रहूंगी

पर क्या.. कम से कम तुम
कभी ये समझ पाओगे
की हों तुम मेरी
जिंदगी में इतना ज्यादा

की मैं इसे कम नही कर पाती …….

 

 

 

सब्र उबल रहा है ….

सामान्य

 

 

 

पानियों में भी
कई बार
सूखे रह जाते
हैं खेत

जैसे समंदर किनारे
प्यासी पड़ी
रहती है रेत

हंसती हुई
धोखा देती है
नदी

चीखते विवादों में
सांसें लेता है
एक मौन

मुस्कराहट के कर्ज
चुकाते हैं आंसू

आलिशान दीवारों पर
भी दर्द परतों
में जमी रहती है

सब्र उबल रहा है …..सावधान !!!!!

 

 

 

बांसुरी की तान ……..

सामान्य

 

 

 

बांसुरी की तान
नही ले जाती  मुझे
राधा के गांव
कदम्ब की छाँव
कान्हां के बाहों में

बासुरी की आवाज
आती है मेरे घर
के सामने वाले
रास्ते से हर रोज
जब वो तीस साल का
बुढा सा दिखने वाला
आदमी
अपने जीवन की
सबसे कीमती सांस
फूकता है और
बजाता है एक गीत

हम बने तुम बने एक दूजे के लिए …

कितने समय वो
बासुरी बजाता घुमता
गली गली

घर लौटने पर
उन सारी बांसुरी को
बारी बारी से फूंकता
उसका छह साल का
नौजवान बेटा
एक धुन निकालने
की तैयारी में थक जाता

खांसी  से बेहाल पिता के सीने पर
सर धरे सो जाता और
सपने में इकट्ठा करता
तमाम पांच रूपये
जिनसे उसने खूब धुनें
बेचीं थी

सुबह होते ही पिता
फिर उसी क्रम में
शुरू करता अपना दिन

बांसुरी  की नाँव को
अपनी सांसों के
नदी में डुबो देता
और उबरने के
रास्ते पर चल पडता ………

फिर वही गीत …हम बने तुम बने ………

 

 

 

तुम्हारी याद का रंग …हरा है …

सामान्य

अपने अतीत के
उस बंजर जमीन से
जब भी बतियाता हूं
मैं बेखुदी में ..

कुछ हरा हरा
आँखों में उतरने
लगता है

ओह ..ये तुम थी
जरा सी देर को
बिलकुल मनमौजी
अपने होने को सहज
जताती ..जैसे
पेड जताता है
अपनी छाँव को

मेरी खंडहर सी
वीरान जिंदगी में
तुम हों सावन सी बसी

आज भी मेरी
आँखों के डोरों पर
तेज पेंग मारती
धरा के इस उस पार तक
मैं बस मध्य में खड़ा
तुम्हारे झूले को
गति देता

तुम्हारी खिलखिलाहट
मेरे समूचे शरीर पर
अबीर मल जाती है

और मैं वर्तमान की
सुनी डालियों पे
अतीत के उस
मखमली हरे को
सहलाता रहता हूं …..

आज रात काली थी ……

सामान्य

पेड़ों के पत्तों

पर बैठी रात

कांप रही थी

 

कांटें अंधेरों की

पीठ को कर रहे थे

जख्न्मी हवाएं

चीख रही थी

 

कीचड़ में फस

गए सपनों  के पैर

हिचकियाँ बंध सी गई थी

 

सूखी छाती से

खिचता रहा जन्मा

बच्चा जिंदगी

मिमियाता रहा बार बार

 

बादलों के पीछे

छिप गया चाँद

घाव गहरा था

करती रही चांदनी

मरहम पट्टी

 

कहीं बाहर आती है

दादा के छड़ी

गिरने की आवाज

सन्नाटें चिहुक जाते है

 

आज रात काली थी बहुत ……..

 

वो पिली तितली …

सामान्य

बचपन में एक तितली पकड़ी थी
चटक पीले रंग वाली
उड़ ना जाये के डर से
मसल सा दिया हथेलियों में

मेरी हथेलियों में एक
रेशमी रंग है आज भी

बस उभरती है
उदास आखें कभी
कभी फडफडाती है
वो पीले रंग वाली तितली
और मैं अपने उस
बिसरे अतीत की
अनजानी गलती पर
सुबकती हूं …सहलाती हूं
अपनी हथेलियाँ
जो अब पिली पड
गई हैं ……