Monthly Archives: जून 2012

बारिश एक सी क्यों नही ….

सामान्य

हमेशा की तरह बारिश आई

लेकर आई खूब सारी ठंडी हवा

 

ओर तरह तरह के खानों की योजनाएं

वहीं दूसरी ओर सामने की

झोपड़ी में भीगी आँखे

क्यों की भींग गए उनके कपडे

जो उन्हें पहनने थे आज काम

पर जाने के लिए

ओर भींग गई उनकी कुल

जमा तीन चादरें जिसपर

सो जाते थे छह लोग जैसे तैसे

अब काटेंगे रातें जैसे तैसे

चूल्हों की आग  रहेगी ठंडी

ओर पेट की मांग पूरी

नही होने पर दी जायेगी गालियाँ

एक दूसरे को ही

औरतें सुलायेंगी अपने

मासूमों को इत्ती सी जगह में 

जो बची रहेगी सूखी

बारिश नही लाती

बराबर की खुशी

काश वो लाती

उनके लिए भी

सुलगती आग

पेट भर खाना

सूखा बिस्तर

ओर वो खिडकी

जिसपर उनके बच्चे

भी खड़े होकर

देखते बारिश को हाथ में लेकर …….

 

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एसाइड

हमेशा की तरह बारिश आई

लेकर आई खूब सारी ठंडी हवा

 

ओर तरह तरह के खानों की योजनाएं

वहीं दूसरी ओर सामने की

झोपड़ी में भीगी आँखे

क्यों की भींग गए उनके कपडे

जो उन्हें पहनने थे आज काम

पर जाने के लिए

ओर भींग गई उनकी कुल

जमा तीन चादरें जिसपर

सो जाते थे छह लोग जैसे तैसे

अब काटेंगे रातें जैसे तैसे

चूल्हों की आग  रहेगी ठंडी

ओर पेट की मांग पूरी

नही होने पर दी जायेगी गालियाँ

एक दूसरे को ही

औरतें सुलायेंगी अपने

मासूमों को इत्ती सी जगह में 

जो बची रहेगी सूखी

बारिश नही लाती

बराबर की खुशी

काश वो लाती

उनके लिए भी

सुलगती आग

पेट भर खाना

सूखा बिस्तर

ओर वो खिडकी

जिसपर उनके बच्चे

भी खड़े होकर

देखते बारिश को हाथ में लेकर …….

 

हमेशा…

बारिश एक सी क्यों नही …….

सामान्य

हमेशा की तरह बारिश आई

लेकर आई खूब सारी ठंडी हवा

 

ओर तरह तरह के खानों की योजनाएं

वहीं दूसरी ओर सामने की

झोपड़ी में भीगी आँखे

क्यों की भींग गए उनके कपडे

जो उन्हें पहनने थे आज काम

पर जाने के लिए

ओर भींग गई उनकी कुल

जमा तीन चादरें जिसपर

सो जाते थे छह लोग जैसे तैसे

अब काटेंगे रातें जैसे तैसे

चूल्हों की आग  रहेगी ठंडी

ओर पेट की मांग पूरी

नही होने पर दी जायेगी गलियां

एक दूसरे को ही

औरतें सुलायेंगी अपने

मासूमों को इत्ती सी जगह में 

जो बची रहेगी सूखी

बारिश नही लाती

बराबर की खुशी

काश वो लाती

उनके लिए भी

सुलगती आग

पेट भर खाना

सूखा बिस्तर

ओर वो खिडकी

जिसपर उनके बच्चे

भी खड़े होकर

देखते बारिश को हाथ में लेकर …….

जिंदगी बनाती है जिम्मेवार ….

सामान्य

कई बार बुझ जाती है
वो आग जिसपर
सेंकती हूं
मैं दिन की रोटी
आंसुओ से खारी
पड़ती है रोटी
और आग नही जलती
उतनी देर जितनी
उसे जलनी चाहिए

और इस तरह
आटे पानी आंसू
और आग के खेल
में ..मैं जलती भी हू
सिकती भी हूं

पर नही बुझने देती
भूख

यही तो है
जो बनाती है
हमे जीवन को लेकर
कुछ और जिम्मेवार ….

इन्तजार करुगी …..

सामान्य

हथेलियों में पसीजता समय
साथ के खत्म होने की बेचैनी

फिर मिले ना मिले
आँखों से छलकते सवाल

जबाब में बस कोरी मुस्कराहट
और स्पर्श की नरमी

तुम दे जाते हों मुझे हर बार
अगली बार मिलने का एक बहाना

और उस बहाने को अपने सीने से लगा
मैं करती हूं एक और बार
तुमसे मिलने का खूबसूरत इंतजार ……..

साथ तुम्हारा …..

सामान्य

पट पट बूंदें गिरती अनवरत
टीन की छत पर
हम नींद में उठ जाते परेशां हों
अम्मा !नींद नही आएगी ….
कितनी आवाज है

अम्मा कहती अरे सुनो
भगवन सुना रहा है लोरी तुम्हें
अपने को खुश्किसम्त समझो
पक्के घरों के अंदर नही आती ऐसी आवाजें
चलो सो जाओ ..और हम सो जाते

पानी के बौछार से भीगते रहे
तो कहती देखो भगवान अपनी खुशी
तुम्हारे साथ बाँट रहा है
तुम्हें खुश होना चाहिए
और हम खुश हों जाते …

और जो कभी पडजाता खाना कम
हम भूख की शिकायत करते
अम्मा कहती आया है कोई मेहमान आज
भगवान के घर उसने हमसे माँगा
तो इनकार कैसे करते
हम मान जाते

कैसा रिश्ता जोड़ा था अम्मा ने
कमियों का भगवान के साथ
कम में भी कम नही सोचने दिया कभी

आज बरसों बाद भगवन हमारे साथ है
क्यों की है अम्मा हमारे साथ 
जो मुस्कराती रही हमेशा
हर कमी बेसी में ..और दी मुसकराने की कितनी वजहें …

 

अब मुझे तय करने दो …

सामान्य

तुमने हमेशा तय की
मेरी सीमाएं
मेरा होना नही होना भी

तुमने तय की
मेरे अंदर बाहर की
जिंदगी

मेरे तौर तरीके
बातचीत
मेरे दोस्त, मेरा परिवार भी
तय कर दिया तुमने

अब मुझे तय
करने दो

की तुम्हें क्या

तय करना चाहिए क्या नही ……