Monthly Archives: मई 2012

मौसम सी हो जाती थी ..

सामान्य

समंदर में जब रात डूबने लगे
थके दिन से मन उबने लगे
सन्नाटों की थपकियों से मन सहम जाये
झरनों की लय भी जो कभी थम जाये

हवाएं यू ही बस बेमानी सी बहतीं रहें
सिसकियाँ दबा सा दर्द सहती रहें
उजाले की तलाश में भटका हो अँधेरा

किरणे मद्धिम सी रात को सुलगाती रहें
आँखों से नींद दूर दूर जाती रहे

तब समझाना जिंदगी अपने आप की तलाश में है
जीने की कोशिश में मन जिंदगी के आस पास है ….

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मौसम सी हो जाती थी ..

सामान्य

शाखों पर शाम उतरती थी
उजियाले बादल पर चलकर
अंधी सी रात बिखरती थी
फिर चुपके से दिन जाता था
दूर कही छिप जाता था

अंजानी राहों पर चलकर
भटकी सी हवा गुजरती थी
धीरे से कुछ कह जाती थी
एक भोली पगली लडकी वो
चुप सी सहमी जो रहती थी

फूलों की चादर पर चलकर
सन्नाटें की उंगली थामें
मौसम से मिलने आती थी
और मौसम सी हो जाती थी

चिड़ियों से बातें करती थी
तितली के संग उड़ जाती थी
हमने उस पगली लड़की का
सूना सूना घर देखा है .

मैंने खोने का उत्सव मनाया

सामान्य

मैंने खोने का उत्सव मनाया
जिस दिन खो गई थी
मुसकराहट खूब हसीं थी
इतने की आंसू निकल जाये

मैंने अकेलेपन को
उस अकेली शाम के
उस निर्जीव से गड्ढे
में फेक दिया था
ओर बटोर ली थी
तमाम यादें जिन्होंने
मुझे अकेला नही होने दिया

मुझे जब भी कहना
था, मुझे नही सुना
किसी ने ओर अब
जब मैं बुनती हूं
सन्नाटें सब बार बार कहते
कुछ कहा तुमने?

मैंने कभी शिकायत
नही की तब भी नही
जब तुमने ये कह कर
की तुम कितनी अच्छी हो
मेरे हिस्से की स्याही से
अपना पहला प्रेम पत्र लिखा
और वो खाली पेन लौटाया मुझे

जिससे मैं कभी नही लिख
पाई अपने मन की
जो मैं तुम्हें देना चाहती थी .

मैंने हमेशा एक हारी हुई
बाजी खेली
और तुम खेल रहे हो आज भी
अपने जीत जाने की जिद्द में .

ये रंग मंच है

सामान्य

उम्मीदों की आंखे
जब डबडबा जाएँ

और थपकियों में
लोरियों का असर
कम सा होने लगे

इंतजार के अलाव पर
चिंगारियां सिसकने लगे
तब तुम अपने हिस्से की
मुस्कराहटें बांटना

ये रंगमंच है
दृश्य बदलते देर
नही लगती यहाँ…

बेगाना बस ना कर मुझको

सामान्य

तार बना दे रेशम का
सपनों के मोती मैं गुथु
फिर हार बना के तू अपना
लिपटा रखना तेरे सिने से

या धुंआ बना देना मुझको
तेरे आस पास रह जाउंगी
तेरे चाय की प्याली से होकर
तेरे आँखों में बस जाउंगी

नफरत है तो नफरत ही कर
बेगाना बस ना कर मुझको …

थका हुआ हूं मुझे सुला दो

सामान्य

हौले से बादल सरकाकर
बोला चांद पास में आकार
सो जाओ क्यों जिद्द करती हो
मेघों ने रस्ता रोका था
मज़बूरी मेरी भी समझो
कोशिश पूरी करता हूं मैं
जल्दी से मिलाने आ जाऊ

मुझको भी मिलना है तुमसे
बातें भी कितनी करनी है
देर हो गई माफ करो अब
देखो मैं भी रो दूँगा …
एक भोला साथी खो दूँगा

भटके बादल को जाना था
पास मुझे भी तब आना था
चाहे जीतनी सजा मुझे दो
माफ करो सब बैर भुला दो
थका हुआ हूं मुझे सुला दो …

गीत बन जाउंगी एक दिन .

सामान्य

गीत बन जाउंगी एक दिन
बांसुरी की तान पर
झूमती पुरवाई संग
बहका करुँगी

फूल बन जाउंगी एक दिन
एक अकेली डाल पर
सुरखाब रंग इतराउंगी मैं
दूर तक महका करुँगी

ख्वाब बन जाउंगी एक दिन
रात से धोखा करुँगी
नींद से वादे करुँगी
खूब तरसाउंगी सबको
सब मेरी चर्चा करेंगे

रेत बन जाउंगी एक दिन
सोखने को अश्क तेरे
तुम बरस जाना
कभी जो पास आना
पैरों तले बिछ जाउंगी मैं
याद अपनी छोड जाना

कुछ नही तो मैं बनूँगी
लाडली अपने पिता की
गीत उनकी जिंदगी की
फूल सी नाजुक सी गुडिया
ख्वाब उनके हौसलों की
रेत की ऐसी कहानी
सौप देंगे जब पराये हाथ में वो
तब पिता के हाथ में
एहसास बन चिपकी रहूंगी
फिर विदा हो जाउंगी मैं

                                                                  ख्वाहिशे अपनी समेटे ..