Monthly Archives: अप्रैल 2012

हम अंधियारे के धागे में ..

सामान्य

हम अंधियारे के धागे में

एक रात पिरोते रहते है

इक्छाओ को डपट डपट कर

उम्मीदों से भी लड लड कर

मन की सभी उड़ानों को

तन की सीमा पार नही करने देते

हम अंधियारा के धागे में

बस ख्वाब पिरोते रहते है ..

तन्हाई को कभी नही

रोने देते है

बचा नही जो उसको भी ना

खोने देते है

खुशियों के मुह पर

पट्टी बाँधे रहते है

हम बदकिसमत इस दुनिया में

बस भाग्य पिरोते रहते है …..

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याद आओगी मुझे तुम …

सामान्य

वक्त के दहलीज पर ठहरी हुई

उम्मीद के अंतिम किरण सी

स्वप्न के भ्रमजाल में सहमी हिरन सी

आस भी उम्मीद जब खोने लगे

उस वक्त चमकी तुम किरण सी

हार के भी जीत जाए ,प्राण की बाजी लगी हो

कर्तब्य का आभाष दो

इस आचरण सी

जिंदगी के गर्त में मैं डूब जाऊ

पी रहा होता अँधेरा

रौशनी सी ओंढ लेती हो

मुझे तुम आवरण सी

तुम हो कविता.या कहानी

याद रहती हो मुझे तुम

व्याकरण सी

मैं हथेली में कभी जब

भोर को चूमा करुगा

याद आ जाओगी मुझको

आचमन सी ……

मेरी पहचान है क्या ??

सामान्य

मैं एक नाम नही

कोई रिश्ता भी नही

मेरी कोई पहचान नही

दूसरों से पहचान बनती है मेरी

मेरा आस्तित्व नही कुछ

मैं घर का एक जरुरी सामान हू

कभी खाना ,कभी पानी

कभी बिस्तर हू मैं

कभी त्योहारों पर थाली में

परोसा जाने वाला कोई पकवान भी हू

मैं एक हस्ताक्षर हू

कभी पुरे हुए आर डी/एफ डी /

या कभी बेटे के रिजल्ट पर एक कोने सिमटी

सी दिख जाती हू

बीमारी का इलाज हू,बूढ़े पिता की लाठी

बेटे का खोया हुआ क्राफ्ट पेपर ,या मार्कर कभी कभी

मैं एक सिस्टम हू

जिसकी प्रोग्रामिंग महीने के पहले हफ्ते की जाती है

दूध वाला, सब्जी वाला, काम वाली

का एटीम मशीन

मुझे याद नही मैंने आखिरी बार अपना नाम कब सुना था

शायद अम्मा ने जगाया था ,भाई से लड गई थी राखी के दिन

या फिर कॉलेज खतम होने पर

डिग्री लेते वक्त ..सचमे याद नही

अब यादहै तो बस इतना बारिश के पहले छाता निकला है

घर में छूटते पेंट को ठीक करना है ,दवाइय लानी है

बिस्तर का चादर बदलना है

मैं हू घर का जरुरी हिस्सा

सब यहाँ आते है ,खाते है सोते है ,और चले जाते है

मैं चौकन्ना रखती हू हर घड़ी

उनकी जरूरत से पहले उनतक पहुच जाऊ

गलती से भी अगर जो ले लिया मेरा नाम किसी ने

संभव है मैं पहचान न पाऊं….

उम्मीदे जिंदा है

सामान्य

उम्मीदों की एक माला है

हर मोती एक कहानी है

संयम की सुई से गुथी

धीरज के धागों पर अटकी

हर मोती के अपने सपने

हर सपनो के रंग अलग अलग

मेरे जीवन की थाती है

जो सपने पुरे हुए नही

जो होते होते रह जाते

मैंने सबकुछ संजोया है

पाया कम ज्यादा खोया है

पलपल छलछल आँखे छलकी

जब भी सपने बनते ..बुनते ..मिल भी जाते

मैंने जीवन के हर पल को

इस रंग बिरंगे जीवन की

माला में जलते पाया है …

जीने दो ये रचती है …

सामान्य

उड़ गए आकाश सारे

बह गई धरती कही

जल गए सपनो के पौधे

दर्द सुबह सह गई

कौन देखा शाम क्यों

खामोश गुमसुम सा रहा

लडखडाती सी हवाओ

ने कहा,कुछ न कहा

जन्म लेते ही कुचल दे

दौर ये चलता रहा

फर अजन्मा ख्वाब

कैसी मौत देखो मर गया

लड़कियों को मार कर

जो जीत का दम भर रहे

कौन समझाए उन्हें

किसपर सितम वो कर रहे

एक दिन ये मौन टूटेगा

प्रलय हो जायेगा

फिर मनु आदम बना

श्रदा से मिलाने आएगा …..

तुम्ही में कैद हू मैं

सामान्य

तुम्हारी आंख में ठहरी नदी मैं

तुम्हारे हाथ के किसमत की रेखा

तुम्हारे साथ थी जब कुछ नही थी

आज भी बिन तुम्हारे कुछ नही मैं

तुम्हारे भाग्य का जलता दिया हू

बुझी सी रात का जलता सा तारा

तेरे खामोश से लम्हों की आहट

तेरे ही शांत मन का शोर हू मैं

तेरी बेचैन रातों का सुकू हू

तेरे हारे पलों का हौसला मैं

तुम्हरी सोच में बिखरी सी खुशबू

तेरे होठों की ही मुस्कान हू मैं

तेरे चाहत में ही आज़ाद थी मैं

तेरे ही कैद में उन्मुक्त हू मैं

बदली सी हो तुम

सामान्य

ओढ़ लेती हो उदासी दिन ढले

तुम कहाँ रखती हो सारी सलवटें

अब जरा सी बात पे रोती नही हो

मुस्कराती हो बिना ही बात के

अब झपट के तुम पड़ती ही नही हो आहटें

दस्तको को भी सहज लेने लगी हो

खो गई हो या की तुमको मिल गया सब

अब नजर कातर सी भी दिखती नही है

टकटकी बांधे हवाओ से नही करती हो बातें

तुम समय के साथ हो या मैं कही ठहरा हुआ हू

बावली सी लग रही हो तुम मुझे

डर रहा हू …

रात भर बादल घूमढ़ता है यहाँ

अब जो बरसा बाँध सारे तोड़ देगा ..